योग के अंग

योग की शुरुआत सबसे पहले कब हुई यह कहना मुश्किल हैं। वेदों से लेकर भगवद्गीता में भी योग का उल्लेख मिलता है। पहले योग की शिक्षा केवल मौखिक रूप से दी जाती थी। योग को लिखित रूप में संगृहीत करने का काम सबसे पहले महर्षि पतंजली ने किया और इसीलिए इसे 'पतंजलि योगसूत्र' के नाम से भी जाना जाता हैं।

 

  1. आसन: आसन स्थिर और आरामदायक बैठने की स्तिथि को आसन कहा जाता हैं। योग में अनेक उपयोगी आसनों का वर्णन किया गया हैं।
  2. प्राणायाम: एक विशेष लय में श्वास लेने की क्रिया को प्राणायाम कहा जाता हैं। प्राणायाम का मुख्य उद्देश हमारे फेफड़ो की कार्यक्षमता को बढ़ाना और मन की चंचलता को कम कर उस पर विजय प्राप्त करना हैं।
  3. प्रत्याहार: प्रत्याहार हमारे इन्द्रियों को एकाग्र कर उनका विषयो से ध्यान हटाने को प्रत्याहार कहा जाता हैं। इससे मन को काबू में किया जा सकता हैं।
  4. धारणा: धारणा अपने चित्त को एक विशेष स्थान पर केन्द्रित करने को धारणा कहा जाता हैं। इससे हमारी एकाग्रशक्ति में वृद्धि होती हैं।
  5. ध्यान: केवल एक वस्तु पर ध्यान केन्द्रित कर अन्य सभी बाह्य वस्तु का ज्ञान तथा उनकी स्मृति न होने की स्तिथि को ध्यान कहा जाता हैं।
  6. समाधि:चित्त ध्येय वस्तु के चिंतन में पूरी तरह लीन हो जाने की स्तिथि को समाधि कहा जाता हैं। इसे आत्मा से परमात्मा का मिलन या मोक्ष की स्तिथि भी कहा जाता हैं।

 

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